भरत तिवारी एनकाउंटर और लोकतंत्र की चुनौती

किसी भी लोकतंत्र के लिए सबसे चिंताजनक स्थिति वह नहीं होती जब कोई नागरिक सरकार की आलोचना करता है, बल्कि वह होती है जब उसे यह विश्वास ही नहीं रह जाता कि उसकी आवाज़ सुनी जाएगी। उस क्षण व्यवस्था और नागरिक के बीच का संवाद टूटने लगता है, और संवाद का स्थान अविश्वास, आक्रोश तथा अंततः टकराव ले लेता है।

भोजपुर के बिलौटी गांव के युवक भरत भूषण तिवारी का प्रकरण इसी टूटते हुए संवाद की कहानी प्रतीत होता है। उपलब्ध सूचनाओं के अनुसार वह गंगा कटाव और विस्थापन से प्रभावित लोगों के मुद्दों को उठाता रहा। उसने प्रशासन तक अपनी बात पहुँचाने की कोशिश की, विरोध भी किया और अंततः एक ऐसे रास्ते पर पहुँच गया जहाँ हथियार उसके हाथ में था और राज्य की शक्ति उसके सामने।

इसके बाद जो हुआ, उसने केवल एक परिवार को शोकाकुल नहीं किया, बल्कि लोकतांत्रिक शासन, पुलिस की कार्यप्रणाली और नागरिक अधिकारों पर गंभीर बहस छेड़ दी।

सबसे पहले एक सिद्धांत स्पष्ट रहना चाहिए—कानून अपने हाथ में लेना किसी भी परिस्थिति में उचित नहीं ठहराया जा सकता। यदि किसी व्यक्ति ने हथियार उठाया, पुलिस को धमकाया या उस पर गोली चलाई, तो यह गंभीर अपराध है। लोकतंत्र का अर्थ अराजकता नहीं है।

लेकिन उतना ही महत्वपूर्ण दूसरा सिद्धांत भी है—राज्य की शक्ति असीमित नहीं होती। वह संविधान, कानून और नैतिक जवाबदेही से बंधी होती है। इसलिए प्रत्येक पुलिस कार्रवाई, विशेषकर जिसमें किसी नागरिक की मृत्यु हो जाए, कठोर सार्वजनिक परीक्षण की पात्र होती है।

भरत तिवारी प्रकरण का सबसे असहज पक्ष यही है कि इसके इर्द-गिर्द अनेक विरोधाभासी दावे मौजूद हैं। कहीं उन्हें मानसिक रूप से अस्थिर बताया गया, कहीं उन्हें सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में प्रस्तुत किया गया, कहीं उन्हें सशस्त्र हमलावर कहा गया और कहीं यह आरोप लगा कि आत्मसमर्पण की संभावना के बावजूद घातक बल का प्रयोग हुआ।

ऐसे परस्पर विरोधी दावों के बीच किसी पूर्वनिर्धारित निष्कर्ष पर पहुँचना न्यायसंगत नहीं होगा। आवश्यकता निष्पक्ष, पारदर्शी और समयबद्ध जांच की है, ताकि सत्य अफवाहों या राजनीतिक विमर्श का बंधक न बने।

इस घटना का सबसे उपेक्षित पक्ष गंगा कटाव है। हर वर्ष नदियाँ हजारों परिवारों से उनकी जमीन, घर और आजीविका छीन लेती हैं। विकास योजनाओं और राहत घोषणाओं के बावजूद अनेक लोग वर्षों तक अनिश्चितता में जीते हैं। जिनके लिए भूमि केवल संपत्ति नहीं बल्कि पहचान, इतिहास और भविष्य होती है, उनके विस्थापन का दर्द सरकारी फाइलों की भाषा में नहीं समझा जा सकता। यदि ऐसे समुदायों की शिकायतें लगातार अनसुनी रहें, तो सामाजिक असंतोष का जन्म होना स्वाभाविक है।

यहीं लोकतंत्र की परीक्षा शुरू होती है। क्या हमारी प्रशासनिक संरचना इतनी संवेदनशील है कि वह किसी नागरिक को चरम निराशा तक पहुँचने से पहले सुन सके? क्या शिकायत-निवारण की संस्थाएँ इतनी प्रभावी हैं कि एक युवा को अपनी बात मनवाने के लिए सनसनीखेज और खतरनाक कदम न उठाने पड़ें? यदि इन प्रश्नों का उत्तर नकारात्मक है, तो दोष केवल व्यक्ति का नहीं, व्यवस्था का भी है।

घटना का एक और महत्वपूर्ण पहलू पुलिसिंग की प्रकृति से जुड़ा है। आधुनिक लोकतांत्रिक समाजों में पुलिस केवल दमनकारी शक्ति नहीं, बल्कि संकट-प्रबंधन संस्था भी है। उसे अपराध रोकना है, लेकिन जहाँ तक संभव हो जीवन भी बचाना है। विशेष रूप से ऐसे मामलों में जहाँ सामने वाला व्यक्ति मानसिक तनाव, सामाजिक आक्रोश या भावनात्मक असंतुलन में हो, प्रशिक्षित वार्ताकारों, मनोवैज्ञानिकों और चरणबद्ध रणनीति का उपयोग किया जाता है।

यदि हर गतिरोध का अंत गोली से होने लगे, तो राज्य और समाज के बीच विश्वास का आधार कमजोर पड़ जाएगा।

यह भी चिंताजनक है कि सार्वजनिक विमर्श लगातार दो ध्रुवों में बँटता जा रहा है। एक पक्ष बिना पूरी जांच के पुलिस को दोषी ठहरा देता है, जबकि दूसरा पक्ष किसी भी मुठभेड़ को स्वतः न्यायोचित मान लेता है। दोनों दृष्टिकोण लोकतांत्रिक विवेक के प्रतिकूल हैं। कानून का शासन भावनाओं पर नहीं, साक्ष्यों पर चलता है। इसलिए निष्पक्ष जांच की मांग पुलिस-विरोध नहीं, बल्कि कानून के शासन के प्रति सम्मान है।

इस पूरे प्रकरण से एक गहरी राजनीतिक सीख भी निकलती है। लोकतंत्र केवल मतदान का नाम नहीं है; वह निरंतर संवाद की व्यवस्था है। यदि नागरिकों को लगता है कि ज्ञापन, आवेदन, जनसुनवाई और प्रशासनिक प्रक्रियाएँ निष्प्रभावी हैं, तो लोकतांत्रिक संस्थाओं पर उनका भरोसा कम होने लगता है। यह स्थिति किसी भी सरकार के लिए चेतावनी है, चाहे उसका राजनीतिक रंग कुछ भी हो।

साथ ही नागरिक समाज को भी यह समझना होगा कि हथियारबंद प्रतिरोध जनसंघर्ष की नैतिक शक्ति को क्षीण कर देता है। इतिहास बताता है कि स्थायी परिवर्तन प्रायः संगठित जनमत, वैधानिक संघर्ष और सार्वजनिक दबाव से आए हैं, न कि व्यक्तिगत उग्रता से। इसलिए भरत तिवारी की कहानी को यदि केवल शहादत या केवल अपराध की कहानी बना दिया जाएगा, तो हम उससे मिलने वाले वास्तविक सबक खो देंगे।

इस घटना के बाद यदि केवल पुलिस कार्रवाई की वैधता पर बहस होगी और गंगा कटाव, विस्थापन, प्रशासनिक उदासीनता तथा ग्रामीण संकट जैसे मूल प्रश्न पीछे छूट जाएँगे, तो यह एक और अवसर का नष्ट हो जाना होगा। किसी भी त्रासदी का सबसे रचनात्मक उपयोग यही है कि वह नीति-निर्माताओं को अपनी प्राथमिकताओं पर पुनर्विचार करने के लिए बाध्य करे।

लोकतंत्र की शक्ति उसकी संवेदनशीलता में निहित है। वह अपने आलोचकों से डरता नहीं, उन्हें सुनता है। वह असहमति को देशद्रोह नहीं मानता, बल्कि सुधार का अवसर समझता है। और वह बल प्रयोग को अंतिम विकल्प मानता है, पहला नहीं।

भरत तिवारी अब लौटकर नहीं आएँगे। किंतु यदि उनकी मृत्यु के बाद भी गंगा कटाव से उजड़ते परिवारों की पुकार अनसुनी रही, यदि प्रशासनिक तंत्र अपनी जवाबदेही पर आत्मचिंतन न करे और यदि पुलिस सुधार केवल रिपोर्टों तक सीमित रहें, तो यह केवल एक युवक की मृत्यु नहीं होगी—यह लोकतांत्रिक संवेदना की पराजय होगी।

किसी भी सभ्य राष्ट्र की पहचान उसकी ताकत से नहीं, उसकी सुनने की क्षमता से होती है। जो व्यवस्था अपने सबसे व्यथित नागरिक की आवाज़ समय रहते सुन लेती है, उसे बंदूक की नौबत कम ही आती है। और जो व्यवस्था केवल तब जागती है जब गोलियाँ चल चुकी हों, उसे अंततः अपने ही मौन का हिसाब देना पड़ता है।

(शैलेंद्र चौहान लेखक-कवि हैं और अनियतकालिक पत्रिका धरती के संपादक हैं।)

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